जौ में तेजी से बढ़ रही निर्यात मांग ने पिछले 15 दिनों में इसके दामों में 125 रुपए क्विंटल की तेजी ला दी है और अभी इसके थमने के आसार नहीं है। इसकी वजह देश में जौ का स्टॉक बुरी तरह घटकर दो लाख बोरी रहने और विदेशी मांग का जारी रहना है। यदि ये दोनों कारण बने रहते हैं तो आने वाले दिनों में जौ के दाम 1400 रुपए क्विंटल के करीब पहुंच जाए तो अचरज नहीं होना चाहिए।
भारतीय बाजार में जौ निर्यातकों की मांग की वजह से पिछले दो सप्ताह के अंदर इसके दाम 15 फीसदी बढ़ चुके हैं। आमतौर पर जौ की कीमतों में जोरदार तेजी दिसंबर-जनवरी में देखी जाती है जब इसकी आपूर्ति का ऑफ सीजन चल रहा होता है। लेकिन इस बार आयातकों की जबरदस्त मांग के सहारे इसमें समय से पहले ही भारी उछाल आ गया है। करीब दो महीने पहले जौ का हाजिर एवं वायदा भाव 750 रुपए प्रति क्विंटल चल रहा था जो इस समय उछलकर 1150 रुपए प्रति क्विंटल से आगे निकल गया है।
जौ का निर्यात कोरिया, सउदी अरब और अन्य पश्चिम एशियाई देशों को हो रहा है। यह निर्यात कंडला बंदरगाह से किया जा रहा है। कंडला से जौ का निर्यात 1225 रुपए प्रति क्विंटल एफओबी पर हो रहा है। इसमें डिलीवरी केंद्र जयपुर और श्रीमाधोपुर से लगने वाला परिवहन शुल्क शामिल है। पश्चिम एशिया में अब तक यूक्रेन का जौ छाया हुआ था लेकिन अब इन देशों ने भारत की ओर भी रुख किया है। क्योंकि यूक्रेन में जौ के निर्यात पर रोक लगी हुई है जिससे यह मांग भारत की ओर मुड़ी है।
कारोबारियों का कहना है कि जौ के भाव को मौजूदा स्तर पर स्थिर हो जाना चाहिए मगर हालात ऐसे बन रहे हैं कि इसमें स्थिरता लंबे समय तक कायम नहीं रहेगी और इसमें तेजी का रुख जारी रहेगा। लेकिन, निर्यात मांग कुछ समय के लिए सुस्त पड़ती है तो जौ के दाम 50-100 रुपए क्विंटल नरम पड़ सकते हैं। जौ के दाम मजबूत रहने के पीछे एक कारण इसकी नई फसल आने में करीब सात आठ महीने का समय होना है। जौ की नई फसल अगले वर्ष मार्च-अप्रैल में आएगी। जौ रबी कालीन फसल है इसलिए इसकी नई आवक आने में अभी लंबा समय बाकी है। ऐसी हालत में विदेशी और घरेलू मांग को पुराने उपलब्ध स्टॉक से ही पूरा करने की विवश्ता रहेगी।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2006-07 के सीजन में लगभग 13 लाख 40 हजार टन जौ का घरेलू उत्पादन हुआ जो 2005-06 के सकल अनुमानित उत्पादन 12 लाख 20 हजार टन से 1।20 लाख टन ज्यादा है। राजस्थान, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा एवं मध्य प्रदेश आदि जौ के प्रमुख उत्पादक राज्यों में शामिल हैं। जौ के उत्पादन में राजस्थान देश्ा का अग्रणी राज्य है जहां सम्पूर्ण राष्ट्रीय उत्पादन का एक तिहाई से अधिक जौ का उत्पादन होता है। इस राज्य की मंडियों में फिलहाल करीब डेढ़ लाख बोरी स्टॉक मौजूद होने का अनुमान है। जबकि देश की अन्य मंडियों में 50 हजार बोरी के करीब जौ का स्टॉक होगा।
कारोबारियों की मानें तो चालू वर्ष में जौ के भावों में आए उछाल से किसान अगले सीजन में अधिक से अधिक क्षेत्रफल में जौ की खेती करना चाहेंगे और नई फसल पर भी जौ के वे भाव नहीं रहेंगे जो इस साल के सीजन की शुरूआत तक रहते आए हैं। जौ को आम तौर पर एक मोटा एवं सख्त अनाज माना जाता है। जिसकी फसल को विशेष देखभाल की जरुरत नहीं पड़ती है और जिसमें प्रतिकूल मौसम को सहने की क्षमता अन्य फसलों से अधिक होती है। जाड़े के सीजन में बारिश की एक हल्की बौछार से फसल की हालत बेहतर हो जाती है। जौ के सम्पूर्ण उत्पादन का करीब 30 फीसदी हिस्सा औद्योगिक खपत में जाता है जबकि शेष हिस्सा पशु आहार और अन्य उद्देश्यों में इस्तेमाल होता है।
September 18, 2007
जौ में रहेगी गर्मी
September 7, 2007
निमाड़ में उपजेगी 30-32 लाख बोरी लाल मिर्च
मध्य प्रदेश के निमाड़ इलाके में इस साल लाल मिर्च की बोआई पिछले साल की तुलना में 50-70 फीसदी ज्यादा हुई जिसकी वजह से इस साल लाल मिर्च के ऊंचे रहे भाव हैं। लाल मिर्च का जो आरंभिक उत्पादन सामने आ रहा है उसके अनुसार निमाड़ में झंकार लाल मिर्च 40 फीसदी, रोशनी 40 फीसदी और जलवा वैरायटी का उत्पादन 20 फीसदी होगा। झंकार लाल मिर्च आंध्र प्रदेश के खम्मम इलाके की तेजा मिर्च के समान मानी जाती है। मध्य प्रदेश की सालाना खपत 10-15 लाख बोरी है। जबकि यहां आंध्र प्रदेश की मिर्च के भी खूब ग्राहक हैं, यही वजह है कि यहां के कारोबारी आंध्र प्रदेश की लाल मिर्च नियमित रुप से मंगाते हैं। मध्य प्रदेश की लाल मिर्च दिल्ली, राजस्थान, बिहार में भी बिकने जाती है लेकिन सर्वाधिक कारोबार इसका नागपुर में होता है।
लाल मिर्च की फर्म मोहनलाल ओंकारलाल अग्रवाल के कारोबारी पिंटू का कहना है कि राज्य में इस साल 25-30 लाख बोरी (प्रति बोरी 40 किलो) लाल मिर्च का उत्पादन होगा। निमाड़ की मंडियों में नई लाल मिर्च की आवक अक्टूबर के दूसरे सप्ताह से आएगी। लाल मिर्च में इस समय मांग सुस्त है लेकिन इसमें अगले 15 दिन में बारिश के कुछ कमजोर पड़ने पर मांग निकलने की उम्मीद है। तीसरी व चौथी तुड़ाई की लाल मिर्च यहां मार्च-अप्रैल में आती है और इसके बाद पांचवी तुड़ाई आती है जो फटकी के समान होती है। खंडवा मंडी में झंकार लाल मिर्च 5500 रुपए और रोशनी 3500-4500 रुपए क्विंटल बिल्टी बोली जा रही है, जबकि जलवा मिर्च बाजार में उपलब्ध नहीं है।
किसानों का कहना है कि यदि बीज बेहतर किस्म के हो तो लाल मिर्च की सातवीं तुड़ाई भी हो सकती है। लेकिन जिन किसानों ने पहले काम में लिए बीजों के संस्करण डाले उनमें लाल मिर्च का उत्पादन घटेगा क्योंकि बीज कंपनियों ने इन बीजों को दूसरी बोआई के लायक नहीं बनाया है और किसानों को बीज कंपनियों से ताजा बीज खरीदना ही पड़ता है। निमाड़ की इन मंडियों की सबसे बड़ी कमी यह है कि यहां कोल्ड स्टोरेज नहीं हैं और लाल मिर्च कोल्ड स्टोरेज में रखने के लिए इंदौर भेजनी पड़ती है। इंदौर में प्रति बोरी दस रुपए महीना चार्ज लगता है। खंडवा और सनावद मंडियों में आढ़त प्रणाली आज भी कायम है व यहां आवक बोरियों में होती है, जबकि बेडिया, धामनोद, कुच्छी, मनावर और खरगौन मंडियों में किसान पोटलों में लाल मिर्च लाते हैं और कारोबारी सीधे नीलामी के माध्यम से इसे खरीदते हैं।
किसानों का कहना है कि लाल मिर्च के बीज का भाव 15-20 हजार रुपए प्रति किलो है, जो काफी महंगा है। एक एकड़ में तकरीबन सौ ग्राम बीज लगता है और लाल मिर्च का उत्पादन 8-18 क्विंटल तक होता है। मध्य प्रदेश में एक एकड़ भूमि यानी 44 हजार वर्ग फीट (200x200 का प्लाट) जमीन होती है। लाल मिर्च में सबसे अधिक लागत मजदूरी के रुप में आती है। एक किलो सूखी लाल मिर्च पर चार से पांच रुपए किलो मजदूरी आती है। एक किलो लाल मिर्च सूखकर दो सौ ग्राम के आसपास रह जाती है। राज्य में बारिश के मौसम की विदाई के बाद लाल मिर्च की फसल को आठ से दस बार पानी देना होता है। यह पानी हर 15 दिन के बाद देना होता है।
हालांकि यदि सर्दी ज्यादा पड़ती है तो पानी कम देना होता है। यह पानी दिवाली के बाद देना शुरू हो जाता है। इस पूरे पानी के लिए किसानों की लागत तकरीबन दो से ढाई हजार रुपए बैठती है। इसके अलावा यूरिया, डीएपी, गोबर खाद चार से पांच बार देना होता है। इसके अलावा सूखा और कोकडा बीमारी लगने पर दवाओं का छिड़कावा करना होता है। मध्य प्रदेश में लाल मिर्च की बोआई पहली बारिश के बाद 15 जून के आसपास शुरू होती है और यह जुलाई के पहले सप्ताह तक चलती है। लाल मिर्च का पौधा खूब फैलता है जिसकी वजह से दो पौधों के बीच ढाई से साढ़े तीन फीट की दूरी रखी जाती है।
लाल मिर्च के कारोबारी दिलीप ट्रेडर्स के दिलीप जैन का कहना है कि लाल मिर्च में मध्य प्रदेश का नाम 1998 में उभरकर तब आया जब यहां 42/45 लाख बोरी का उत्पादन हुआ था। इससे पहले लाल मिर्च के उत्पादन और कारोबार में मध्य प्रदेश की भूमिका नहीं थी। वे कहते हैं कि राज्य में इस साल 35/40 लाख बोरी (प्रति बोरी 30/35 किलो) लाल मिर्च का उत्पादन होगा। वे कहते हैं कि एक समय मालवा के क्षेत्र जावरा, मंदसौर और नीमच में भी लाल मिर्च की खूब पैदावार होती थी लेकिन अब वहां यह उत्पादन बेहद कम रह गया है व निमाड़ ही लाल मिर्च के लिए जाना जाता है। जैन कहते हैं कि देश में इस साल लाल मिर्च की बोआई ज्यादा होगी क्योंकि किसानों ने लाल मिर्च को काफी तेज देखा है। वे कहते हैं कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और मलेशिया में लाल मिर्च की फसल को नुकसान हुआ है, जबकि चीन लोकतांत्रिक देश न होने से वहां आई बाढ़ के बावजूद उत्पादन आंकड़े सामने आना कठिन है। इन देशों में हुए नुकसान का फायदा भारतीय लाल मिर्च को होगा।
लाल मिर्च की बारीकी बताते हुए वे कहते हैं कि मध्य प्रदेश और कर्नाटक की लाल मिर्च का छिलका पतला होता है, जबकि आंध्र प्रदेश की लाल मिर्च का छिलका मोटा होता है। मध्य प्रदेश की लाल मिर्च का छिलका पतला होने से इसका रंग जल्दी चला जाता है। इसकी वजह वे यहां पड़ने वाली सर्दी की मानते हैं। राज्य में लाल मिर्च को तोड़कर धूप में सूखाना पड़ता है जबकि आंध्र प्रदेश में फसल जनवरी मध्य के बाद आती है और वहां पड़ने वाली गर्मी की वजह से यह पौधे पर ही सूख जाती है जिससे इसका प्राकृतिक रंग और स्वाद लंबे समय तक बने रहता है।
September 2, 2007
कर्नाटक में आलू को भारी नुकसान
कर्नाटक में आलू के खेतों में पानी भरने से फसल के सड़ने के बाद मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और गुजरात में भारी बारिश के कहर से आलू की फसल पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। यही वजह है कि देश की विभिन्न मंडियों में आलू एक सप्ताह में 150 रुपए क्विंटल तक बढ़ गया है।
कर्नाटक में इस साल सामान्य से अधिक बारिश हुई है और यह पानी यहां के खेतों में भर गया है जिससे आलू की फसल प्रभावित हुई है। पानी की मार झेल रहे आलू में इस बीच कीड़े लग गए जिससे अब कर्नाटक में आलू का उत्पादन कम होने की आशंका जताई जा रही है। किसानों का कहना है कि अगस्त के दूसरे सप्ताह में कर्नाटक में जोरदार बारिश हुई जिससे आलू के खेत पानी में डूब गए। पौधे की जड़ों में धूप की तपिश न पहुंचने से जड़ में बनने वाली गांठ यानी आलू में कीड़ा लग गया। साथ ही खेतों में पानी भरा होने से आलू में सड़न पैदा हो गई। इस सड़न से तकरीबन 20 फीसदी फसल नष्ट हो गई है। बाकी बची फसल में आधी फसल कीड़ों की चपेट में है।
हालांकि, किसानों ने कीटनाशकों को काम में भी लेना चाहा लेकिन ये कीट आलू की फसल को जितना नुकसान पहुंचा सकते थे, उतना नुकसान हो चुका और इसे रिकवर नहीं किया जा सकता। कई जगह किसान पहले कीटनाशक अधिक मात्रा में डाल चुके हैं और कृषि विशेषज्ञ अब और कीटनाशक न डालने की सलाह दे रहे हैं। किसानों का कहना है कि कर्नाटक में आलू इलाकों में अब फिर बारिश हुई तो लगभग पूरी फसल ही चौपट हो जाएगी। कर्नाटक में आलू की फसल को हुए नुकसान का वास्तविक आंकलन आलू की खुदाई हो जाने के बाद ही हो पाएगा। कर्नाटक में आलू की खुदाई जल्दी ही शुरू होगी। जबकि, आगरा और तारकेश्वर साइड आलू की बोआई शुरू हो गई है। गौरतलब है कि कर्नाटक में इस साल 12-13 लाख टन आलू पैदा होने का अनुमान लगाया गया था। चिप्स बनाने के काम आने वाला आलू हसन किस्म का होता है जो देश में पैदा होने वाले कुल आलू उत्पादन 2.72 करोड़ टन का केवल पांच फीसदी होता है।
देश में इस साल आलू का उत्पादन 2.61 करोड़ टन होने की उम्मीद है। इतना आलू पैदा होने पर तकरीबन दस लाख टन आलू की देश में कमी रहेगी। कर्नाटक से आलू की फसल में आए बुरे समाचारों के बाद मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और गुजरात में भारी बारिश होने से आलू की फसल के बिगड़ने का डर फैल गया है। यही वजह है कि आलू के दाम देश भर की मंडियों में एक सप्ताह में 150 रुपए प्रति क्विंटल तक बढ़ गए हैं। मुंबई वाशी मंडी में सुपर क्वॉलिटी आलू 1050/1100 रुपए और सेकंड क्वॉलिटी आलू 950/1050 रुपए प्रति क्विंटल बिक रहा है। दिल्ली की आजादपुर मंडी में कोल्ड स्टोरेज आलू 550/660 रुपए प्रति अस्सी किलो बिक रहा है, जबकि शिमला आलू 900/1000 रुपए प्रति अस्सी किलो है।
हल्दी में नहीं थमेगी तेजी
हल्दी की बोआई देश में इस साल लगभग 25 फीसदी कम होने और स्टॉकिस्टों की पकड़ से अब इसमें बड़ी मंदी बीते दिनों की बात बनने वाली है। हल्दी उत्पादक इलाकों से आ रहे आंकड़ों के मुताबिक अगले सीजन में इसका आरंभिक उत्पादन 40-41 लाख बोरी (प्रति बोरी 75 किलो) रहने की संभावना है। उत्पादन घटने की इस आशंका की वजह से स्टॉकिस्ट अपने पास रखी हल्दी बेचने की जल्दबाजी में नजर नहीं आ रहे हैं, जबकि हल्दी की घरेलू और निर्यात मांग बनी हुई है।
देश में 25 अगस्त तक हल्दी का स्टॉक 22-23 लाख बोरी (प्रति बोरी 75 किलो) था, जो पूरी तरह स्टॉकिस्टों के हाथ में है। किसान अपने पास रखी हल्दी पहले ही बेचकर खाली हो चुके हैं। पिछले तीन महीने से हल्दी में गिरावट थम गई है और धीरे धीरे इसके भाव बढ़ते जा रहे हैं जो इस बात का संकेत हैं कि हल्दी मजबूत हाथों में है। निजामाबाद में स्टॉकिस्टों के पास दो लाख बोरी हल्दी है, जबकि सांगली में स्टॉकिस्टों के पास सवा दो लाख बोरी, दुग्गीराला में चार लाख बोरी, ईरोड में साढ़े पांच लाख बोरी और वरंगल में डेढ़ लाख बोरी हल्दी है। हल्दी हाजिर बाजार की बात करें तो पिछले एक महीने में निजामाबाद क्वॉलिटी में हल्दी के दाम 150 रुपए, देसी कडप्पा में दो सौ रुपए और ईरोड क्वॉलिटी में सौ रुपए क्विंटल की बढ़त आ चुकी है।
देश में हल्दी की बोआई लगभग पूरी हो चुकी है। इस साल हल्दी की बोआई 25 फीसदी घटी है, जबकि कुछ जगह यह 30 फीसदी तक कम है। महाराष्ट्र के किसानों की रुचि गन्ने में बढ़ी है तो आंध्र प्रदेश के किसान लाल मिर्च और सोयाबीन से जुड़े हैं। यही हाल तमिलनाडु का है। आंध्र प्रदेश में निजामाबाद साइड पानी की तंगी है जिससे हल्दी की मौजूदा फसल को पानी मिलने की उम्मीद कम है। गौरतलब है कि हल्दी की नौ महीने की फसल को आठ पानी की जरुरत पड़ती है जो इस बार मिलना कठिन लग रहा है।
देश में इस साल 52 लाख बोरी हल्दी का उत्पादन हुआ, जबकि अगले सीजन में यह 40-41 लाख बोरी रहने का आरंभिक अनुमान है। देश में हल्दी की खपत निर्यात सहित 48-49 लाख बोरी है। अगले सीजन में हल्दी का ओपनिंग स्टॉक 12-13 लाख बोरी रहने का अनुमान है। जबकि इस ओपनिंग स्टॉक में से सात से आठ लाख बोरी हल्दी किसी भी भाव पर नहीं बिकेगी क्योंकि हर साल इतनी हल्दी डेड स्टॉक के रुप में रहती है। कम फसल का अनुमान और मांग जारी रहने से अगले साल फरवरी/मार्च तक हल्दी हाजिर में मौजूदा भाव स्तर से आठ सौ रुपए क्विंटल तक बढ़ सकती है।
सांगली में निजामाबाद क्वॉलिटी हल्दी 2290/2740 रुपए, देसी कडप्पा 2450/2750 रुपए, सेलम 2990/3530 रुपए और राजापुरी बेस्ट 2790/3440 रुपए प्रति क्विंटल बोली जा रही है। ईरोड में हल्दी के दाम 2075/2125 रुपए क्विंटल बोले जा रहे हैं।



