June 15, 2007

चांदी में है चांदी

चांदी जिसे कभी सस्‍ती धातु के रुप में जाना जाता था, के प्रति लोगों की धारणा बदलती जा रही है। चांदी के दामों में पिछले कई वर्षों के दौरान लगातार बढ़ोतरी हुई है उसे देखकर नहीं लगता है कि इसे अब सस्‍ती धातु की श्रेणी में रखा जा सकता है। वर्ष 2006 के दौरान चांदी की कीमतों में 58 फीसदी की तेजी दर्ज की गई। औद्योगिक मांग में भारी बढ़ोतरी होना चांदी में प्रमुख तेजी का कारण माना गया। चांदी की मांग में हो रही बढ़ोतरी को देखते हुए इसके दाम निकट भविष्‍य में 15 डॉलर प्रति औंस पहुंच सकती है। भारतीय रुपए में बात करें तो चांदी के दाम 22 हजार रुपए प्रति किलो तक जा सकते हैं।

चांदी के बढ़ते दामों से यह लगता है कि इसमें किए गए निवेश पर आप चांदी काट सकते हैं। बढ़ते औद्योगिकीकरण से भारत में भी चांदी की मांग में हालांकि केवल दो फीसदी का इजाफा हुआ है लेकिन इस मांग के भविष्‍य में बढ़ने की उम्‍मीद है। हालांकि, देश में चांदी का आयात भी घटा है। वर्ष 2007 के लिए चांदी का प्रारंभिक स्‍टॉक इसके पिछले साल की तुलना में घटकर 1221 टन रहा। भारत में चांदी के आयात में 2006 में तकरीबन 80 फीसदी की बड़ी गिरावट दर्ज की गई। एमएमटीसी की चांदी की खुले बाजार में की जाने वाली बिक्री में पिछले साल वर्ष 2005 के मुकाबले 27 फीसदी की कमी आई। वैसे इन वर्षों में चांदी के वैश्विक तैयार भंडार में भी कमी आई। क्‍योंकि इस दौरान चांदी की आपूर्ति करने वाली विश्‍व की अनेक खदानों में कामकाज काफी कम मात्रा में हुआ। भारत में चांदी का कम आयात का असर इसकी स्‍क्रैप आपूर्ति पर देखा जा सकता है। जो वर्ष 2006 में 2005 की तुलना में 40 फीसदी ज्‍यादा हुआ।

भारत में वर्ष 2005 और 2006 के दौरान चांदी की मांग व आपूर्ति पर नजर डालें तो वर्ष 2006 में इसका स्‍टॉक 2373 टन रहा जबकि आयात वर्ष 2006 में 500 टन और वर्ष 2005 में 1100 टन था। स्‍क्रैप वर्ष 2006 में 800 टन और वर्ष 2005 में 1100 टन रहा, जबकि चांदी की बिक्री वर्ष 2005 में 500 टन और वर्ष 2006 में 700 टन पहुंच गई। चांदी की कुल उपलब्‍धता वर्ष 2006 में 4481 टन और वर्ष 2005 में 5973 टन रही। चांदी की मांग की बात करें तो वर्ष 2006 में आभूषण क्षेत्र की मांग 400 टन और वर्ष 2005 में 536 टन, निवेश मांग वर्ष 2006 में 600 टन, वर्ष 2005 में 800 टन, सजावटी सामान के लिए वर्ष 2006 में चांदी की मांग 3260 टन और वर्ष 2005 में 3600 टन देखी गई। वर्ष 2006 में औद्योगिक उपयोग के लिए चांदी की मांग 2260 टन और 2005 में 2200 टन देखी गई।

चांदी की बढ़ती कीमतों का असर भारत में अनेक उद्योगों की घटती मांग से देखा जा सकता है। भारत के आभूषण, निवेश और सजावटी सामान बनाने वाले उद्योगों में वर्ष 2005 की तुलना में क्रमश: 33 फीसदी, 25 फीसदी और नौ फीसदी की गिरावट आई। हालांकि, इस गिरावट से चांदी की कीमत पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है क्‍योंकि इसकी कीमतों में मंदी या तेजी विदेशों में इसकी मांग व आपूर्ति से तय होती है। शार्ट टर्म में चांदी 13.25/13.90 डॉलर प्रति औंस बिकने की उम्‍मीद है। लेकिन लांग टर्म की ओर ध्‍यान दिया जाए तो चांदी 15 डॉलर प्रति औंस पहुंच सकती है। हालांकि, सोने व तांबे में होने वाली उठापटक का खासा असर चांदी पर भी पड़ता है। चांदी यदि 14.77 डॉलर प्रति औंस के ऊपर टिकती है तो यह 15 डॉलर तक पहुंच जाएगी और भारतीय बाजार में इसके भाव 22 हजार रुपए प्रति किलो पर पहुंच जाएंगे। चांदी में आने वाली तेजी की प्रमुख वजह निवेशकों की बढ़ रही मांग के साथ एक्‍सचेंज ट्रेड फंडों खुलना भी है।

June 14, 2007

मौसम जानो, पैसा कमाओ

नेशनल कमोडिटी एंड डेरीवेटिव्‍स एक्‍सचेंज यानी एनसीडीईएक्‍स वर्ष 2003 से देश में मौसम वायदा शुरू करने की कोशिश में है लेकिन अब तक एक्‍सचेंज की मंशा हकीकत में नहीं बदल पाई है। एक्‍सचेंज एक बार फिर पूरे जोर शोर से मौसम वायदा लाने की तैयारी में है, लेकिन वायदा शुरू करने के लिए कानून में बदलाव की जरुरत को देखते हुए यह काम थोड़ा मुश्किल लग रहा है। इसके अलावा इस तरह के वायदा में कारोबारी भागीदारी जुटाना भी एक्‍सचेंज के लिए एक चुनौती होगी।

अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर शिकागो मर्केंटाइल एक्‍सचेंज यानी सीएमई और यूरोनेक्‍सट में मौसम आधारित वायदा में कामकाज होता है, जिस देखते हुए एनसीडीईएक्‍स भी इस तरह के वायदा भारत में लांच करने की फिराक में है। गौरतलब है कि तमाम वैज्ञानिक प्रगति के बावजूद अभी भी मौसम पर हमारी निर्भरता काफी है। मौसमी परिस्थितियां काफी हर तक आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित करती है, विशेषकर कृषि, ऊर्जा, मनोरंजन, निर्माण व यातायात जैसे उद्योगों की आय पर मौसम का काफी असर पड़ता है। सीएमई द्धारा 1999 में तापमान इंडेक्‍स आधारित वायदा शुरू करने से पहले उद्योगों के पास मौसम से जुड़े जोखिम के प्रबंधन के लिए कम ही विकल्‍प थे। इस मामले में मौमस बीमा एक बेहतर विकल्‍प था, लेकिन इससे सिर्फ भारी जोखिम व कम संभाव्‍यता वाली मौसमी दुर्घटनाओं को ही कवर किया जाता है, तापमान बढ़ने या घटने जैसी अधिक संभाव्‍यता व कम जोखिम वाली मौसमी स्थितियों के कारण किसी कंपनी को होने वाले नुकसान को कवर नहीं किया जाता। ऊर्जा क्षेत्र या कृषि क्षेत्र की आय पर तापमान की घटबढ़ या बारिश का काफी असर पड़ता है, इसलिए इन उद्योगों को कम जोखिम व ज्‍यादा संभाव्‍यता वाली मौसमी स्थितियों से निपटने के लिए मौसम वायदा काफी मददगार होते हैं।

सीएमई में जो मौसम वायदा चलते हैं वे तापमान पर आधारित हैं। एक्‍सचेंज में कूलिंग डिग्री डे सीडीडी व हीटिंग डे एचडीडी नामक तापमान इंडेक्‍सों के आधार पर वायदा चलते हैं। सीडीडी इंडेक्‍स की वैल्‍यू उन दिनों के तापमान को प्रदर्शित करती है जब ऊर्जा का उपयोग हीटिंग के लिए होता है। दिन का तापमान सामान्‍य से जितना कम है वह उस दिन की सीडीडी वैल्‍यू है और दैनिक सीडीडी वैल्‍यू को जोड़कर मासिक इंडेक्‍स बनता है। सीडीडी पर आधारित वायदा का मूल्‍य सीडीडी वैल्‍यू को 20 डॉलर से गुणा करके निकाला जाता है, यहां 20 डॉलर प्रति डिग्री तापमान का आर्थिक प्रभाव दर्शाता है। एचडीडी इंडेक्‍स की वैल्‍यू उन दिनों के तापमान को प्रदर्शित करता है जब ऊर्जा का उपयोग एयरकंडीशनिंग के लिए होता है। इस इंडेक्‍स में बाकी सब चीजें समान होती है, बस इतना फर्क होता है कि एचडीडी वैल्‍यू तापमान सामान्‍य जितना अधिक होता है उतनी होती है।

तापमान इंडेक्‍स अमरीका के 15 शहरों व यूरोप के पांच शहरों के तापमान में होने वाले बदलाव पर आधारित हैं। तापमान आधारित वायदा की अवधारणा यह है कि तापमान अगर सामान्‍य से कम या ज्‍यादा रहता है तो जिन कंपनियों व लोगों की आय पर इसका असर पड़ता है वे अपने जोखिम को तापमान इंडेक्‍स आधारित वायदा के माध्‍यम से हेज कर सकते हैं। उदाहरण के लिए तापमान कम होने से एयरकंडीशिनिंग के लिए बिजली की जरुरत कम हो जाएगी, ऐसे में कोई भी ऊर्जा कंपनी सामान्‍य से कम तापमान के कारण बिजली की खपत में आई कमी और इसके नतीजन होने वाले नुकसान की भरपाई तापमान इंडेक्‍स आधारित वायदा के माध्‍यम से कर सकती है। ऊर्जा कंपनियों के अलावा दूसरी कंपनी या व्‍यक्ति जिनका कारोबार तापमान में होने वाले बदलाव से प्रभावित होता है, वे भी इन वायदा से लाभ उठा सकते हैं।

जहां तक एनसीडीईएक्‍स की पहल का सवाल है तो यहां सबसे बड़ी चुनौती फारवर्ड कांट्रैक्‍ट रेग्‍युलेशन एक्‍ट में संशोधन की है। एक बार यह संशोधन हो जाता है तो तापमान या बारिश के इंडेक्‍स पर आधारित वायदा लांच करने में कोई मुश्किल नहीं होगी। लेकिन यहां पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब घरेलू एक्‍सचेंज भौतिक कमोडिटी के वायदा में कं‍पनियों व हाजिर कारोबारियों की भागीदारी नहीं जुटा पाए, तो मौमस जैसी इनटेंजीबल चीजों के वायदा में कारोबारी रूचि कहां तक बना पाएंगे और अगर ऐसा नहीं होता है तो मौसम वायदा भी अन्‍य कमोडिटीज की तरह सट्टेबाजों के खेल के मैदान बन जाएंगे और इनमें व देश के गली मोहल्‍लों में मौमस पर होने वाले अवैध सट्टे में कोई अंतर नहीं रह जाएगा।

June 4, 2007

मूंग में बढ़ेगी मंदी


मूंग में मंदी का दौर अभी पूरा नहीं हुआ है। घरेलू बाजारों में बिहार, आंध्र प्रदेश के अलावा म्‍यांमार से नई मूंग आ रही है और जल्‍दी ही महाराष्‍ट्र, राजस्‍थान, उत्‍तर प्रदेश की नई मूंग का दबाव इसके दामों को तोड़ने का काम करेगा। साथ ही मध्‍य प्रदेश, गुजरात की मूंग पहले ही भावों को ढीला कर चुकी है। कारोबारियों पर भरोसा करें तो देश में इस साल मूंग की फसल पिछले साल की तुलना में ढाई गुना अधिक है। इस उत्‍पादन बढ़ने की वजह मूंग के न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य में 220 रुपए की बढ़ोतरी होना है। केंद्र सरकार ने मूंग का इस साल न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य 220 रुपए बढ़ाकर 1740 रुपए तय कर दिया है। पिछले साल मूंग की फसल कमजोर होने से इसके दाम जोरदार ढंग से चढ़े थे। पिछले साल मूंग 3400/3600 रुपए प्रति क्विंटल तक बिकी थी जो इस समय 2600/2800 रुपए क्विंटल चल रही है। यंगून की मूंग दिल्‍ली में 3150 रुपए, गुजरात 2600/2700 रुपए और मूंग धोया 3800/4200 रुपए प्रति क्विंटल बिक रही है। मध्‍य प्रदेश में इंदौर में मूंग गर्मी की 2300/2450 रुपए क्विंटल बोली जा रही है जो आज 50 रुपए क्विंटल नरम है। इंदौर में मूंग अक्‍टूबर के आखिर से अब तक तकरीबन एक हजार रुपए क्विंटल टूट चुकी है। राजस्‍थान में जयपुर में मूंग 2700 रुपए मिल डिलीवरी बिक रही है। कारोबारियों का कहना है कि मूंग की आवक का आने वाले दिनों में दबाव बढ़ेगा और यह 2200 रुपए क्विंटल तक आ जाए तो अचरज नहीं होना चाहिए।

चना चलेगा धीमी चाल

चना अगले दस दिनों तक धीमी चाल चलेगा। चने में गति इस बात पर निर्भर है कि आने वाले दिनों में बेसन की कैसी मांग निकलती है। मानसून के छाने के बाद देश भर में बेसन की मांग बढ़ती है और उस समय चने के दाम 50/100 रुपए क्विंटल बढ़ सकते हैं अन्‍यथा चना हाजिर में 2000/2300 रुपए क्विंटल के बीच घूमता रहेगा।

देश में इस वर्ष लगभग 52 लाख टन चना पैदा हुआ है जो सरकारी आंकड़े 59 लाख टन की तुलना में सात लाख टन कम है। हालांकि, आस्‍ट्रेलिया में चने की उपज और रकबे में बढ़ोतरी के समाचार आए हैं। आस्‍ट्रेलिया में इस साल चने का उत्‍पादन तीन लाख टन रहने का अनुमान जताया गया है। पिछले साल जबरदस्‍त सूखे के बावजूद आस्‍ट्रेलिया में 2.21 लाख टन चने की उपज हुई थी। चने की कीमतों पर पड़े दबाव के कई कारण हैं जिनमें इसका आयात करने और दूसरी दलहनों के निर्यात पर रोक मुख्‍य हैं। सरकार ने चने का आयात करने का जो फैसला किया है, उससे अब लगता है कि देश में चने की कमी दिखाई नहीं देगी। साथ ही अमरीकी डॉलर की तुलना में रुपए के मजबूत होने से आयात सस्‍ता बैठ रहा है।

देश की राजधानी दिल्‍ली में चने का स्‍टॉक साढ़े तीन से साढ़े चार लाख टन बताया जा रहा है। लेकिन दाल मिल वाले तभी चना खरीदते हैं जब‍ उनके पास दाल की आपूर्ति का ऑर्डर आता है। दिल्‍ली में इन दिनों रोजाना 30/35 ट्रक चना आता है जबकि इसकी आवक इस समय 125/150 ट्रक होनी चाहिए। मध्‍य प्रदेश की मुख्‍य मंडी इंदौर में भी चने की आवक 10/15 ट्रक है, जबकि आम तौर पर इस समय यह आवक 50/75 ट्रक होती है। मध्‍य प्रदेश में इस साल कांटेवाला चने की उपज दो से तीन लाख टन घटने की रिपोर्ट है।