मध्य प्रदेश के निमाड क्षेत्र में इस साल भी लाल मिर्च की फसल बेहतर स्थिति में है और यहां इसका आरंभिक उत्पादन 30/32 लाख बोरी (प्रति बोरी 40 किलो) रहने का अनुमान लगाया जा रहा है। हालांकि, फसल की पूरी स्थिति का पता इस महीने के दूसरे सप्ताह में चल पाएगा, जब यहां बारिश का मौसम खत्म हो जाएगा। इस बीच, बारिश का मौसम होने से लाल मिर्च की मांग सुस्त है लेकिन अगले दस दिनों के बाद इसमें मांग निकलने की उम्मीद की जा रही है जिसकी वजह से भाव मजबूत है।
मध्य प्रदेश के निमाड़ इलाके में इस साल लाल मिर्च की बोआई पिछले साल की तुलना में 50-70 फीसदी ज्यादा हुई जिसकी वजह से इस साल लाल मिर्च के ऊंचे रहे भाव हैं। लाल मिर्च का जो आरंभिक उत्पादन सामने आ रहा है उसके अनुसार निमाड़ में झंकार लाल मिर्च 40 फीसदी, रोशनी 40 फीसदी और जलवा वैरायटी का उत्पादन 20 फीसदी होगा। झंकार लाल मिर्च आंध्र प्रदेश के खम्मम इलाके की तेजा मिर्च के समान मानी जाती है। मध्य प्रदेश की सालाना खपत 10-15 लाख बोरी है। जबकि यहां आंध्र प्रदेश की मिर्च के भी खूब ग्राहक हैं, यही वजह है कि यहां के कारोबारी आंध्र प्रदेश की लाल मिर्च नियमित रुप से मंगाते हैं। मध्य प्रदेश की लाल मिर्च दिल्ली, राजस्थान, बिहार में भी बिकने जाती है लेकिन सर्वाधिक कारोबार इसका नागपुर में होता है।
लाल मिर्च की फर्म मोहनलाल ओंकारलाल अग्रवाल के कारोबारी पिंटू का कहना है कि राज्य में इस साल 25-30 लाख बोरी (प्रति बोरी 40 किलो) लाल मिर्च का उत्पादन होगा। निमाड़ की मंडियों में नई लाल मिर्च की आवक अक्टूबर के दूसरे सप्ताह से आएगी। लाल मिर्च में इस समय मांग सुस्त है लेकिन इसमें अगले 15 दिन में बारिश के कुछ कमजोर पड़ने पर मांग निकलने की उम्मीद है। तीसरी व चौथी तुड़ाई की लाल मिर्च यहां मार्च-अप्रैल में आती है और इसके बाद पांचवी तुड़ाई आती है जो फटकी के समान होती है। खंडवा मंडी में झंकार लाल मिर्च 5500 रुपए और रोशनी 3500-4500 रुपए क्विंटल बिल्टी बोली जा रही है, जबकि जलवा मिर्च बाजार में उपलब्ध नहीं है।
किसानों का कहना है कि यदि बीज बेहतर किस्म के हो तो लाल मिर्च की सातवीं तुड़ाई भी हो सकती है। लेकिन जिन किसानों ने पहले काम में लिए बीजों के संस्करण डाले उनमें लाल मिर्च का उत्पादन घटेगा क्योंकि बीज कंपनियों ने इन बीजों को दूसरी बोआई के लायक नहीं बनाया है और किसानों को बीज कंपनियों से ताजा बीज खरीदना ही पड़ता है। निमाड़ की इन मंडियों की सबसे बड़ी कमी यह है कि यहां कोल्ड स्टोरेज नहीं हैं और लाल मिर्च कोल्ड स्टोरेज में रखने के लिए इंदौर भेजनी पड़ती है। इंदौर में प्रति बोरी दस रुपए महीना चार्ज लगता है। खंडवा और सनावद मंडियों में आढ़त प्रणाली आज भी कायम है व यहां आवक बोरियों में होती है, जबकि बेडिया, धामनोद, कुच्छी, मनावर और खरगौन मंडियों में किसान पोटलों में लाल मिर्च लाते हैं और कारोबारी सीधे नीलामी के माध्यम से इसे खरीदते हैं।
किसानों का कहना है कि लाल मिर्च के बीज का भाव 15-20 हजार रुपए प्रति किलो है, जो काफी महंगा है। एक एकड़ में तकरीबन सौ ग्राम बीज लगता है और लाल मिर्च का उत्पादन 8-18 क्विंटल तक होता है। मध्य प्रदेश में एक एकड़ भूमि यानी 44 हजार वर्ग फीट (200x200 का प्लाट) जमीन होती है। लाल मिर्च में सबसे अधिक लागत मजदूरी के रुप में आती है। एक किलो सूखी लाल मिर्च पर चार से पांच रुपए किलो मजदूरी आती है। एक किलो लाल मिर्च सूखकर दो सौ ग्राम के आसपास रह जाती है। राज्य में बारिश के मौसम की विदाई के बाद लाल मिर्च की फसल को आठ से दस बार पानी देना होता है। यह पानी हर 15 दिन के बाद देना होता है।
हालांकि यदि सर्दी ज्यादा पड़ती है तो पानी कम देना होता है। यह पानी दिवाली के बाद देना शुरू हो जाता है। इस पूरे पानी के लिए किसानों की लागत तकरीबन दो से ढाई हजार रुपए बैठती है। इसके अलावा यूरिया, डीएपी, गोबर खाद चार से पांच बार देना होता है। इसके अलावा सूखा और कोकडा बीमारी लगने पर दवाओं का छिड़कावा करना होता है। मध्य प्रदेश में लाल मिर्च की बोआई पहली बारिश के बाद 15 जून के आसपास शुरू होती है और यह जुलाई के पहले सप्ताह तक चलती है। लाल मिर्च का पौधा खूब फैलता है जिसकी वजह से दो पौधों के बीच ढाई से साढ़े तीन फीट की दूरी रखी जाती है।
लाल मिर्च के कारोबारी दिलीप ट्रेडर्स के दिलीप जैन का कहना है कि लाल मिर्च में मध्य प्रदेश का नाम 1998 में उभरकर तब आया जब यहां 42/45 लाख बोरी का उत्पादन हुआ था। इससे पहले लाल मिर्च के उत्पादन और कारोबार में मध्य प्रदेश की भूमिका नहीं थी। वे कहते हैं कि राज्य में इस साल 35/40 लाख बोरी (प्रति बोरी 30/35 किलो) लाल मिर्च का उत्पादन होगा। वे कहते हैं कि एक समय मालवा के क्षेत्र जावरा, मंदसौर और नीमच में भी लाल मिर्च की खूब पैदावार होती थी लेकिन अब वहां यह उत्पादन बेहद कम रह गया है व निमाड़ ही लाल मिर्च के लिए जाना जाता है। जैन कहते हैं कि देश में इस साल लाल मिर्च की बोआई ज्यादा होगी क्योंकि किसानों ने लाल मिर्च को काफी तेज देखा है। वे कहते हैं कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और मलेशिया में लाल मिर्च की फसल को नुकसान हुआ है, जबकि चीन लोकतांत्रिक देश न होने से वहां आई बाढ़ के बावजूद उत्पादन आंकड़े सामने आना कठिन है। इन देशों में हुए नुकसान का फायदा भारतीय लाल मिर्च को होगा।
लाल मिर्च की बारीकी बताते हुए वे कहते हैं कि मध्य प्रदेश और कर्नाटक की लाल मिर्च का छिलका पतला होता है, जबकि आंध्र प्रदेश की लाल मिर्च का छिलका मोटा होता है। मध्य प्रदेश की लाल मिर्च का छिलका पतला होने से इसका रंग जल्दी चला जाता है। इसकी वजह वे यहां पड़ने वाली सर्दी की मानते हैं। राज्य में लाल मिर्च को तोड़कर धूप में सूखाना पड़ता है जबकि आंध्र प्रदेश में फसल जनवरी मध्य के बाद आती है और वहां पड़ने वाली गर्मी की वजह से यह पौधे पर ही सूख जाती है जिससे इसका प्राकृतिक रंग और स्वाद लंबे समय तक बने रहता है।




1 comments:
ji acchai jankari lagi.
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