चांदी जिसे कभी सस्ती धातु के रुप में जाना जाता था, के प्रति लोगों की धारणा बदलती जा रही है। चांदी के दामों में पिछले कई वर्षों के दौरान लगातार बढ़ोतरी हुई है उसे देखकर नहीं लगता है कि इसे अब सस्ती धातु की श्रेणी में रखा जा सकता है। वर्ष 2006 के दौरान चांदी की कीमतों में 58 फीसदी की तेजी दर्ज की गई। औद्योगिक मांग में भारी बढ़ोतरी होना चांदी में प्रमुख तेजी का कारण माना गया। चांदी की मांग में हो रही बढ़ोतरी को देखते हुए इसके दाम निकट भविष्य में 15 डॉलर प्रति औंस पहुंच सकती है। भारतीय रुपए में बात करें तो चांदी के दाम 22 हजार रुपए प्रति किलो तक जा सकते हैं।
चांदी के बढ़ते दामों से यह लगता है कि इसमें किए गए निवेश पर आप चांदी काट सकते हैं। बढ़ते औद्योगिकीकरण से भारत में भी चांदी की मांग में हालांकि केवल दो फीसदी का इजाफा हुआ है लेकिन इस मांग के भविष्य में बढ़ने की उम्मीद है। हालांकि, देश में चांदी का आयात भी घटा है। वर्ष 2007 के लिए चांदी का प्रारंभिक स्टॉक इसके पिछले साल की तुलना में घटकर 1221 टन रहा। भारत में चांदी के आयात में 2006 में तकरीबन 80 फीसदी की बड़ी गिरावट दर्ज की गई। एमएमटीसी की चांदी की खुले बाजार में की जाने वाली बिक्री में पिछले साल वर्ष 2005 के मुकाबले 27 फीसदी की कमी आई। वैसे इन वर्षों में चांदी के वैश्विक तैयार भंडार में भी कमी आई। क्योंकि इस दौरान चांदी की आपूर्ति करने वाली विश्व की अनेक खदानों में कामकाज काफी कम मात्रा में हुआ। भारत में चांदी का कम आयात का असर इसकी स्क्रैप आपूर्ति पर देखा जा सकता है। जो वर्ष 2006 में 2005 की तुलना में 40 फीसदी ज्यादा हुआ।
भारत में वर्ष 2005 और 2006 के दौरान चांदी की मांग व आपूर्ति पर नजर डालें तो वर्ष 2006 में इसका स्टॉक 2373 टन रहा जबकि आयात वर्ष 2006 में 500 टन और वर्ष 2005 में 1100 टन था। स्क्रैप वर्ष 2006 में 800 टन और वर्ष 2005 में 1100 टन रहा, जबकि चांदी की बिक्री वर्ष 2005 में 500 टन और वर्ष 2006 में 700 टन पहुंच गई। चांदी की कुल उपलब्धता वर्ष 2006 में 4481 टन और वर्ष 2005 में 5973 टन रही। चांदी की मांग की बात करें तो वर्ष 2006 में आभूषण क्षेत्र की मांग 400 टन और वर्ष 2005 में 536 टन, निवेश मांग वर्ष 2006 में 600 टन, वर्ष 2005 में 800 टन, सजावटी सामान के लिए वर्ष 2006 में चांदी की मांग 3260 टन और वर्ष 2005 में 3600 टन देखी गई। वर्ष 2006 में औद्योगिक उपयोग के लिए चांदी की मांग 2260 टन और 2005 में 2200 टन देखी गई।
चांदी की बढ़ती कीमतों का असर भारत में अनेक उद्योगों की घटती मांग से देखा जा सकता है। भारत के आभूषण, निवेश और सजावटी सामान बनाने वाले उद्योगों में वर्ष 2005 की तुलना में क्रमश: 33 फीसदी, 25 फीसदी और नौ फीसदी की गिरावट आई। हालांकि, इस गिरावट से चांदी की कीमत पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है क्योंकि इसकी कीमतों में मंदी या तेजी विदेशों में इसकी मांग व आपूर्ति से तय होती है। शार्ट टर्म में चांदी 13.25/13.90 डॉलर प्रति औंस बिकने की उम्मीद है। लेकिन लांग टर्म की ओर ध्यान दिया जाए तो चांदी 15 डॉलर प्रति औंस पहुंच सकती है। हालांकि, सोने व तांबे में होने वाली उठापटक का खासा असर चांदी पर भी पड़ता है। चांदी यदि 14.77 डॉलर प्रति औंस के ऊपर टिकती है तो यह 15 डॉलर तक पहुंच जाएगी और भारतीय बाजार में इसके भाव 22 हजार रुपए प्रति किलो पर पहुंच जाएंगे। चांदी में आने वाली तेजी की प्रमुख वजह निवेशकों की बढ़ रही मांग के साथ एक्सचेंज ट्रेड फंडों खुलना भी है।
June 15, 2007
चांदी में है चांदी
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1 comments:
चान्दी ही चाँदी है...
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