काबली चना के किसानों और स्टॉकिस्टों के लिए यह साल मुसीबत भरा बन गया है। देश से पहले दलहनों के निर्यात पर लगी रोक से जहां काबली चना और मसूर उत्पादकों को भारी नुकसान हुआ वहीं काबली चना के निर्यात पर लगी रोक हटने के बाद भी किसानों का सरदर्द कम नहीं हुआ है। तापमान के उबलने और कुछ जगह बूंदाबांदी होने से काबली चने में डंक की शिकायत सामने आई है जिससे इसके निर्यात में बाधा खड़ी हो गई है। निर्यातक कहते हैं कि नगण्य डंक वाला काबली चना भी आप निर्यात नहीं कर सकते और पूरे कंटेनर को बिनवाना असंभव है। लेकिन अब अमरीकी डॉलर की तुलना में रुपया नौ साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच जाने से निर्यात करना कठिन हो गया है। जब तक अमरीकी डॉलर मजबूत नहीं होता, तब तक यह निर्यात कठिन है। बैंकिंग जगत पर भरोसा करें तो रुपया और डॉलर का यह खेल 38 रुपए तक जा सकता है। मध्य प्रदेश के मालवा इलाके की बात करें तो वहां पिछले साल काबली चना का रकबा 30/35 फीसदी था जो इस साल बढ़कर 60 फीसदी पहुंच गया। हमारे दशे में इस साल काबली चना का उत्पादन दस लाख टन होने का अनुमान है, जबकि घरेलू मांग केवल दो से तीन लाख टन। यानी काबली चना को टूटने से बचाना है तो निर्यात के अलावा कोई रास्ता नहीं है, जो इस समय किसी को नहीं सूझ रहा है। मध्य प्रदेश की इंदौर मंडी में आज पांच से सात हजार बोरी काबली चना की आवक हुई, जबकि समूचे राज्य की विभिन्न मंडियों में आवक 20/25 हजार बोरी का अनुमान है। इंदौर में काबली चना बढि़या क्वॉलिटी 2800 रुपए और एवरेज 2650/2700 रुपए क्विंटल बोला जा रहा है। काबली चना के स्टॉकिस्टों ने इसके दाम बढ़ने की उम्मीद में काफी चना तीन हजार रुपए क्विंटल पर स्टॉक कर लिया था, जो अब उनके लिए सरदर्द बन गया है।
May 7, 2007
चना भाड़ नहीं फोड़ सकता
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1 comments:
अच्छी जानकारी है। किसानों को ख़राब हालात से बचाने के लिए सरकार को उन्हें ध्यान में रखकर निर्यात की नीति बनानी चाहिए।
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